
Surendra Bartwal
आज मनुष्य सुविधाओं की दौड़ में रुकता नजर नहीं आ रहा है, सुविधाओं की कोई तय सीमा नहीं है, क्योंकि अहंकार की कभी पूर्ण न होने वाली अपूर्णता ही उसे रुकने नहीं देती। बिना आत्मज्ञान के उसे नहीं पता कि हमारे हर भोग की कीमत है, वह मुफ्त नहीं मिल रहा, प्रकृति को दोहन करके उसकी कीमत चुकाई जा रही है। हमने अपने कर्मों से स्वयं को खतरे में तो डाल ही दिया है, जो जीव इसके लिए दोषी नहीं हैं उनका भी अस्तित्व खतरे में डाल दिया है।




























