
Deepika gupta
बहुत सुंदर हो सकता वो परिवार जो आचार्य जी को सुनता है ,,,लेकिन मेरे परिवार का हर बड़ा सदस्य आचार्य जी के विरोध में ही बोलता है,, आचार्य जी को सुनने से हमारी समझ को एक नई दिशा मिल गई लेकिन परिवार अभी वही अपनी लोकधर्म की सोच पर अड़ा हुआ है,,,ऐसे में साथ रहने में बहुत द्वंद्व उत्पन्न होता है ,,,आचार्य जी को सुनने के बाद हम पीछे तो नहीं हट सकते ,,,परिवार आगे बढ़ने देना ही नहीं चाहता । बस यही रास्ता नजर आता है ,,,छोड़ क्यों नहीं देते हम




























