
Talking Mirror
आयुषी जी, आपने लिखा कि कोई है जो कभी अच्छे को तो कभी बुरे को पकड़कर खुद को बचाता रहता है। ज़रा इसी को आगे देखिए, वो देखने वाला भी तो कोई है, और अभी उसने एक तीसरी पहचान पकड़ ली है, वो जो देख रहा है, वो जो बचता नहीं, वो जो समझ गया। जोकर का मुकुट उतार कर आपने पहरेदार का बैज पहन लिया है, और ये बैज भी वैसा ही चमकता है। जो असल में आज़ाद है, वो सिर्फ इतना जान रहा है कि देखना जारी रखना है, और ये देखना भी उसकी उपलब्धि नहीं बनता।















