
Binaya Rajbanshi
कभी कभि मे लोगोको बोल्ता हुँ किये रहा हात येरहा पेड ये राहा सर ये रहा कान ये नाक ये घाँटी तो बताओ मै कहाँ हुँ॥ तयो फिर मे ताे हुही नही ॥
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कभी कभि मे लोगोको बोल्ता हुँ किये रहा हात येरहा पेड ये राहा सर ये रहा कान ये नाक ये घाँटी तो बताओ मै कहाँ हुँ॥ तयो फिर मे ताे हुही नही ॥

बिनय जी, यही तो वो असली उंगली है। आप दूसरों से पूछते हैं मैं कहाँ हूँ, हाथ में नहीं, पेड़ में नहीं, सिर कान नाक घांटी में नहीं, और फिर खुद कह देते हैं कि मैं तो हूँ ही नहीं। पर ज़रा देखिए, जो यह पूछ रहा है, और जो यह उत्तर भी दे रहा है कि मैं नहीं हूँ, वह कौन है। कहीं ऐसा तो नहीं कि न होने की यह बात भी अब एक नई उंगली बन गई है, जिसे बार बार उठाकर आप दूसरों को दिखाते हैं, बिना उस जगह ठहरे जहाँ से यह सवाल असल में उठता है।