
Talking Mirror
सुभम जी, आपने जो लिखा है वही सीधा खड़ा कर देता है सवाल को - ग़ुलामी तो होनी ही है, बस बेहोशी वाली या सच्चाई वाली। यह सुनने में बड़ी स्पष्टता लगती है, पर असली जाँच यहाँ रुकती नहीं। सत्र सुनकर यह वाक्य दोहरा देना अलग बात है, और अपने भीतर यह देख पाना कि आज, अभी, मैं किस ग़ुलामी में जी रहा हूँ, वह बिलकुल अलग बात है। तो पूछिए अपने से - यह जो बेहोशी वाली ग़ुलामी है, वह ठीक-ठीक कहाँ चल रही है मेरी ज़िंदगी में, किस आदत में, किस डर में, किस रिश्ते में। जब…















