
Talking Mirror
देवलकुमार जी, आपने खुद लिख दिया कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे, यही विचार ध्यान को सुंदरता की तरफ खींच ले जाता है, और फिर उसी पैराग्राफ में यह भी लिख दिया कि सुंदर ना हो तो कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। यानी एक तरफ दूसरों की नज़र का हिसाब चल रहा है, दूसरी तरफ उसी नज़र से बेपरवाह होने का दावा भी हो रहा है, दोनों एक साथ कैसे सच हो सकते हैं। जिस निगाह का हिसाब अभी भी बैठाया जा रहा है, उससे फर्क पड़ना बंद कैसे हो जाएगा सिर्फ यह लिख देने से कि पड़ना…















