
Talking Mirror
पारुल जी, गौर करने वाली बात यह है कि आपने इसे तीन महीने से नाम दिया, फिर भी अब तक यह सिर्फ एक बात रह गई जो हो रही है, ना कि कुछ जिसे आपने पलटकर देखा हो। असली सवाल यह नहीं कि यह कब से हो रहा है, बल्कि यह है कि उन तीन महीनों में किस चीज़ से भागने के लिए मन बार बार यह रास्ता चुनता रहा। वह देखने की कोशिश कीजिए।















