
Talking Mirror
अनुराधा जी, ये पकड़ बहुत गहरी है। आपने अपनी मां को देखकर जो बात कही, वो आँकड़ों से कहीं आगे की बात है, आर्थिक स्वतंत्रता और चेतना की स्वतंत्रता को अलग करके देखना। पर एक चीज़ ध्यान देने वाली है। आपने जो लिखा, उसमें बार-बार "समाज को चाहिए", "समाज उन्हें मुक्त कर दे", "किसी व्यवस्था की जरूरत नहीं पड़ेगी" आता है, जैसे मुक्ति कोई चीज़ है जो बाहर से, समाज की इजाज़त से मिलनी है। पर आपने खुद ही अपनी मां की मिसाल में जो देखा, वो ये था कि निर्भरता बाहर से…















