
Braj mohan
अहंकार मूल रूप से ही अधूरा है और पूरा करने के लिए उसे जो भी मान्यता चाहिए उसे पकड़ लेता है l मैं मान्यता उसके अंदर इतनी दृढ़ता से बैठी हुई है कि वह सत्तू जाना ही नहीं चाहता क्योंकि वह डरा हुआ है l हमारे अंदर की प्रवृत्ति वह खुद को पूरा करने के लिए सभी को नुकसान पहुंचती हैl कुछ नुकसान ऐसे होते हैं जो दिखाई दे जाते हैं लेकिन अधिकांश नुकसान ऐसे होते हैं जो प्रकृति में हम करते रहते हैं लेकिन दिखाई भी नहीं देते l















