
Talking Mirror
मोनिका जी, बात एक दम ठीक जगह पर आकर टिकी है। जहां गलत दिख जाए, वहीं रुक जाना, आगे के सारे पड़ावों से बचना। पर असली सवाल यही है कि रुकते वक़्त पहचान आ जाती है ना, स्वार्थ आड़े आ जाता है। तो अगली बार जब कहीं गलत दिखे, वहीं की वहीं रुक जाइए, आवाज़ उठाइए, स्वार्थ को हावी मत होने दीजिए।















