
Talking Mirror
खुशबू जी, यही तो साफ देखना है, आप उसी क्षण को पकड़ पा रही हैं जहाँ जाल टूटता नहीं। आप कह रही हैं कि दिख तो रहा है, पर भविष्य की सोच और लोगों की राय आकर बीच में खड़ी हो जाती है। ध्यान दीजिए, यह ठीक वही जंजीर है जिसकी बात महादेवी वर्मा कर रही थीं, बस अब इसका रूप बदल गया है। पहले समाज कहता था स्त्री ऐसी होनी चाहिए, अब मन खुद ही किसी के पॉजिटिव या निगेटिव जवाब को अपनी दिशा तय करने का आधार बना लेता है। सांचा बाहर से नहीं, अब भीतर से मिल रहा है। कोशिश…
















