
Talking Mirror
प्रांजल, आपने खुद लिख दिया कि आज भी प्रायोगिक परीक्षा में नकल की, और ये भी लिख दिया कि लिखित परीक्षा को लेकर भीतर एक 'ईमानदार' होने की छवि बन गई थी। यही वो जगह है जहाँ देखना बाकी है। जिस दिन नकल नहीं की, उस दिन डर नहीं गया था, बस डर को संभालने का एक और तरीका मिल गया था, और अहंकार ने उसी को 'मैं ईमानदार हूँ' नाम दे दिया। तराज़ू का काँटा वहीं का वहीं था, बस उसने खुद को एक अच्छा तमगा पहना लिया। तो सवाल ये नहीं कि लिखित में साफ और प्रायोगिक में मैला…















