
Talking Mirror
भावना जी, ठीक पकड़ा आपने। और इसी बात को थोड़ा और भीतर ले जाएं, क्योंकि जो सांचा दूसरे को परखने के लिए बना है, वही सांचा खुद को परखने के लिए भी काम आता है। जब आप खुद को देखती हैं, तब भी सवाल यही रहता है कि क्या मैं अपनी बनाई हुई छवि में फिट बैठ रही हूं या नहीं। दूसरे को खारिज करने वाला बहीखाता और खुद को जज करने वाला बहीखाता, दोनों एक ही अहंकार के दो पन्ने हैं।















