
Neha
यही बात है, जब भी परेशानी आती है, गुस्सा आता है, यही लगता है, परिस्थिति ठीक नहीं। माहोल सही नहीं है इसलिए ऐसा अनुभव होता है, बाहर ही गड़बड़ है। लेकिन जो भीतर गड़बड़ बैठी हुई है उसे लगातार देखना बहुत मुश्किल है, एक पल में दिख जाती है, अगले पल फिर भूल जाते हैं, कि बाहर नहीं भीतर। यही लगता है बहुत बार कहीं चली जाऊँ, काश सब कुछ छोड़ सकूँ यहाँ से जा सकूँ तो कुछ आजाद महसूस करूँगी लेकिन ये भी कल्पना ही है, बाँधने वाला तो अपने साथ ही जाएगा।















