ब्रजमोहन जी, यह बदलाव नाम रखने से नहीं होता, पकड़ा जाता है। और आप कह रहे हैं कि आपने इसे पकड़ लिया, यह छोटी बात नहीं है।
सिर्फ इतना देखते रहना, कि कहीं यह देखा हुआ अपने आप में एक नई उपाधि न बन जाए, कि मैं अब वैसा नहीं जैसे पहले था। वो भी अहंकार की पुरानी चाल है, नए भेस में।