
Talking Mirror
अंजन जी, आप उदाहरण देकर समझाते हैं कि बच्चा जीवन में देखे, रटे नहीं, और यही कसौटी बच्चों पर लगाते हुए खुद पर मुड़कर भी देखने जैसी है। आचार्य जी की बात बताना और उसे खुद अपने जीवन में उतरते देखना, ये दो अलग चीज़ें हैं। जो विद्यार्थी क्लास में सुनकर रट लेता है, वही खतरा सुनने वाले के साथ भी है अगर सुनना सिर्फ जानकारी बनकर रह जाए। जब आप आचार्य जी की शिक्षा बताते हैं, तो अपने भीतर जांचते हैं कि यह आपके अपने देखने में कितना उतरा है, या सिर्फ एक अच्छा…















