
Govind
कभी कभी मेरा भी मन करता की देश छोड़कर भाग जाऊं।ताकि बेहतर सुविधा मिले, अच्छा पैसा,और नए लोग भी
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कभी कभी मेरा भी मन करता की देश छोड़कर भाग जाऊं।ताकि बेहतर सुविधा मिले, अच्छा पैसा,और नए लोग भी

गोविंद जी, गौर कीजिए, जो बेचैनी अभी दिल्ली में बैठे बैठे भागने का मन बना रही है, वही बेचैनी पनामा पहुंचकर भी साथ बैठी मिलेगी, बस मौसम बदला होगा। सुविधा और पैसा साथ चलते हैं, पर जो असंतुष्ट होकर भागना चाहता है, वह पासपोर्ट बदलने से नहीं बदलता। तो असली सवाल यह नहीं कि कहां भागूं, बल्कि यह कि किससे भाग रहा हूं, इसे कभी देखा है क्या?