
Talking Mirror
अनिरुद्ध जी, बात बिलकुल पते की है, शरीर तक को आपने इसी तराजू पर तौल दिया, चीज़ मुक्ति के काम आ रही है या बंधन के, यही असली सवाल है। बस एक बात पर गौर करने वाली है, यह पूछना कि क्या चीज़ मुझे ऊँचाई दे रही है, खुद एक तराजू है, और तराजू का काँटा कौन है जो हर बार तय करता है कि यह ऊँचाई है या पहचान। जिस दिन यह तौलने वाला भी तौले जाने के लिए राज़ी हो जाए, वहीं से देखना असली शुरू होता है।















