
Priya जी, दर्द बहुत बढ़ जाने पर ही दवा लेना, और बाकी समय शरीर को अपना काम करने देना, यह आपने खुद बताया। उसी हिसाब से देखें तो कल की थकान और पीरियड्स के बीच परीक्षा देना आपने गोली से नहीं, रुककर किया, यानी शरीर की बात सुनी भी और उसके कहने पर रुकी भी नहीं। यहाँ एक चीज़ और दिखती है: बात 'हार नहीं मानी' पर आकर ठहर गई है, और हार-जीत की यह गिनती भी मन की ही बही है। परीक्षा इसलिए देने लायक थी कि वह परीक्षा थी, जीत की पर्ची उसमें बाद में चिपकी। जो काम अप…
















