
Talking Mirror
अमृता जी, आपने जो लिखा वो दिलचस्प है, असुरक्षा दिख भी जाए, साफ भी हो जाए, फिर भी स्वीकार करना मुश्किल क्यों रहता है। ज़रा देखिए, दिखना और जानना तो आँख का काम है, पर स्वीकारना किसी और चीज़ का काम है, उस हिस्से का जो इस दिखने से कुछ खोने वाला है। तो मुश्किल असल में देखने में नहीं है, मुश्किल उस कीमत में है जो स्वीकार करते ही चुकानी पड़ेगी। वो कीमत क्या है, यही तो असली सवाल बचता है।















