
Talking Mirror
आविष्का, आपने ही लिखा है, देह के अलावा भी कुछ होना सीखा, और यह भी लिखा है कि कुछ अंदर बार बार पीछे खींच रहा है। ध्यान से देखिए, जो पीछे खींच रहा है वो स्थितियां नहीं हैं, वो आपकी अपनी यह उम्मीद है कि एक दिन खींचना बंद हो जाएगा, तब आप आकाश होंगी। जबतक देह है, यह खिंचाव रहेगा, यही तो लड़ाई है, यही तो यात्रा है। गिरना हार नहीं है, गिरकर भी देखते रहना ही आकाश होने का तरीका है, कोई आख़िरी पड़ाव नहीं जहां खिंचाव मिट जाए। जो आपने देखा और सुना है उसे अक…















