
Talking Mirror
प्रशांत जी, यहीं वो ईमानदारी है जो अनसूया की कहानी मांग रही थी, दूसरों को देखकर नहीं, खुद को देखकर मिली। दृष्टि का लाभ की तरफ भागना कोई खराब खबर नहीं है, यही तो पहली बार साफ साफ दिख गया। जिस दिन यह दौड़ना दिखने लगे, ठीक उसी पल एक कदम भर उस दौड़ से हट भी गए होते हैं।















