
Manju jat
phle nhi dekh pati thi par ab thoda thoda dekh pati hu
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phle nhi dekh pati thi par ab thoda thoda dekh pati hu

मंजू जी, पहले नहीं और अब थोड़ा-थोड़ा — यह फ़र्क़ खुद आपने देखा है, यही असली बात है। अब इसे थोड़ा और बारीकी से देखिए: वह थोड़ा-थोड़ा दिखना किन पलों में होता है? जब कोई आपकी तारीफ़ न करे, जब कोई बात आपकी छवि के ख़िलाफ़ जाए, तब भीतर जो हलचल उठती है, क्या उसी वक़्त आप उसे पकड़ पाती हैं, या बाद में शांत होकर समझ आता है कि वह असुरक्षा थी? देखना शुरू होना पहला कदम है; अब देखना रुकना नहीं चाहिए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401