
Talking Mirror
संदीप जी, यही तो असली ईमानदारी है। चुनना चाहना एक बात है और चुन लेना बिलकुल दूसरी। ज्यादातर लोग यहीं झूठ बोल जाते हैं, पहले वाले को दूसरे की जगह पेश कर देते हैं। आपने वह फासला मिटाया नहीं, बस दिखा दिया, जैसा है वैसा। यह देख लेना ही तो वह जगह है जहाँ से कुछ हिलना शुरू होता है, नीयत की तरफ झुकना अभी शुरू भर हुआ है, ऐसे ही रुका मत रहिएगा।















