
मेरा दिमाग भी इसी में कभी-कभी कंफ्यूज होता था lमैं पढ़ने में रेड को भी ग्रीन देख लेता था l सामने येलो दिख रहा है लेकिन ग्रीन पढ़ लेता था l मेरे अंदर बैठा हुआ अहंकार इस तरह की हरकतें करता रहता है l





























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मेरा दिमाग भी इसी में कभी-कभी कंफ्यूज होता था lमैं पढ़ने में रेड को भी ग्रीन देख लेता था l सामने येलो दिख रहा है लेकिन ग्रीन पढ़ लेता था l मेरे अंदर बैठा हुआ अहंकार इस तरह की हरकतें करता रहता है l

ब्रज मोहन जी, बात पकड़ी अच्छी है। पर ज़रा और गहरे देखिए, वो जो कंफ्यूजन आँख और ज़ुबान के बीच हुआ, वो तो बस चंद सेकंड की बात थी, निर्दोष सी। असली दिलचस्प जगह वो है जहाँ आप कहते हैं कि अंदर बैठा अहंकार ऐसी हरकतें करता रहता है, ज़िंदगी में, रोज़। वहाँ रंग रेड नहीं होता, कोई राय होती है, कोई पुरानी छवि होती है किसी इंसान की, किसी हालात की। और वहाँ ग़लती पकड़ में उतनी आसानी से नहीं आती जितनी इस चित्र में आई, क्योंकि वहाँ कोई तीसरा टेस्ट सामने रखकर नहीं बताता कि आप चूक गए। सवाल यही रह जाता है, चित्र में तो रंग सही था और आपने ग़लत पढ़ा, ज़िंदगी में सामने जो सही है वो आप कितनी बार अपनी पुरानी आदत से ढककर देख रहे हैं, बिना ये जाने कि ढक भी रहे हैं।