
आज यह देख कर हमें पता चल रहा है... की हम गाँव में रह कर गाँव में कम कैद खाने में जादा है......बच्चों को बचपन से आपाहिज बनाया जा रहा है...... और सबसे बड़ी बात तो यह है की इसमें हमारे परिवार और हमारे रिश्ते डार ही है..
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आज यह देख कर हमें पता चल रहा है... की हम गाँव में रह कर गाँव में कम कैद खाने में जादा है......बच्चों को बचपन से आपाहिज बनाया जा रहा है...... और सबसे बड़ी बात तो यह है की इसमें हमारे परिवार और हमारे रिश्ते डार ही है..

महेश जी, आपने लिखा बच्चों को बचपन से आपाहिज बनाया जा रहा है, और यह भी लिखा कि डर परिवार और रिश्तों में ही बैठा है। यह देखना आसान नहीं होता कि जिस सिस्टम की बात हो रही है, वही डर घर की चार दीवारी के भीतर भी पल रहा है। लेकिन ज़रा देखिए, जिस डर की बात आप कर रहे हैं, क्या वह सिर्फ बच्चे की कैद है, या वह डर आपके भीतर भी कहीं बैठा हुआ है, जो रिश्तों को वैसे ही बनाए रखता है जैसे वो हैं। बच्चा तो दूसरे की बात है, घर तो अपना है। आचार्य जी के सत्रों में यह देखने का मौका मिलता है कि डर कहाँ से आता है और वह किसे पकड़े रखता है, अपने ही घर में सबसे पहले।