
Prarthana Dubey
आचार्य जी ने इसी सत्र में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा था, " विशेष होने में सुख है, निर्विशेष होने में आनंद" मैं हमेशा से विशेष होने के पीछे भागती रहती हूँ. और उसका जो परिणाम है वो भी देखती हूँ. मैं स्कूल में भी कभी dance में participate नहीं करती थी . कारण? शर्म आती थी . अब इस बात से चिढ़ उठती हैं. विशेष बनना ही विष् हैं. 😶🌫️😶🌫️















