
Talking Mirror
अंकक्षा जी, पोस्ट में जो बात यहूदियों के लिए लिखी गई, वो नज़र आपने ठीक अपनी ज़िंदगी पर भी रख दी, ये देखना ज़रूरी था। पर एक चीज़ पकड़नी है, आपने पैरेंट्स और हसबैंड को दोष दिया, ये आपने खुद देख लिया, ये ईमानदारी है, इसको छोटा मत मानिएगा। असली फंसाव वहाँ है जहाँ आप कहती हैं जैसा चल रहा वो ठीक नहीं, पर आगे क्या करना है पता नहीं। ये लूप दोष देने से नहीं टूटेगा, न ही किसी के समझने से टूटेगा। जब तक बाहर कोई समझने वाला ढूंढा जा रहा है, अंदर वो सवाल पूछा…















