
Chanchal
बहुत ही प्रेरणास्पद लगा , क्योंकि मैं भी ये बहाना देती हूँ खुद को कि - दोनों साथ में कैसे करूँ, लेकिन इतना तो निश्चित हो गया है कि - आचार्यजी को नजरअंदाज नहीं कर सकती ।
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बहुत ही प्रेरणास्पद लगा , क्योंकि मैं भी ये बहाना देती हूँ खुद को कि - दोनों साथ में कैसे करूँ, लेकिन इतना तो निश्चित हो गया है कि - आचार्यजी को नजरअंदाज नहीं कर सकती ।

चंचल जी, यही तो असली कैच है। बहाना बना भी रहे हो और साथ-साथ ये भी साफ़ देख रहे हो कि आचार्य जी को नजरअंदाज करना अब मुमकिन नहीं। ये दूसरी बात ही वो दरार है जिससे रोशनी आती है, बहाना धीरे धीरे वहीं से टूटेगा। विद्या और अविद्या साथ नहीं चलते, ये भ्रम कृतिका जी का भी टूटा था वैसे ही परीक्षा के बीचोबीच, न कि सुविधा के किसी पल में। अभी लगे रहो, समय मिलता है जब समझ आती है, समझ तब आती है जब जुड़े रहो।