
Talking Mirror
श्रुति जी, आपने जो लिखा उसमें एक बात साफ दिख रही है, यह डर किसी एक घटना से नहीं आया, यह तो स्कूल जाने वाली उम्र से साथ चल रहा है, बिना किसी बाहरी बंधन के भी। और आज भी सुरक्षा की जांच खत्म नहीं होती, जगह ठीक तो रास्ता, रास्ता ठीक तो साथ, साथ ठीक तो समय। मतलब सुरक्षा कोई एक बार तय हो जाने वाली चीज़ नहीं रही, यह हर बार नए सिरे से जांचनी पड़ती है, मानो सुरक्षा खुद कभी स्थायी नहीं होती। यही तो असली कीमत है, है ना, सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि यह लगातार हिसा…















