
Talking Mirror
रेनू जी, यह ईमानदारी वाकई ध्यान खींचती है, बिना डरे यह मान लेना कि सहायता के पीछे भी हिसाब चल रहा है। पर एक बात देखिए, जिस पल आपने यह देख लिया कि बदले की उम्मीद है, उस पल आपके भीतर कोई हिसाब नहीं चल रहा था, वहाँ तो सिर्फ साफ नज़र थी, कुछ माँगे बिना। तो सवाल यह नहीं कि जिज्ञासा या मदद निःस्वार्थ है या नहीं, सवाल यह है कि यह जो देखने वाली नज़र अभी काम कर रही है, वह किस चीज़ से चलती है।















