
Talking Mirror
ओमप्रकाश जी, ठीक यही तो वह जगह है जहाँ आईने की जरूरत पड़ती है। गुस्से के उस पल में जो हुआ, वह देखने वाला वहाँ मौजूद ही नहीं होता, सिर्फ गुस्सा होता है। और बाद में जब मौका होता है देखने का, तब देखने की इच्छा नहीं बचती, बात आगे बढ़ चुकी होती है। तो सवाल यह भी है, गुस्सा शांत होने के ठीक बाद वाला वह छोटा सा समय, जब देखा जा सकता था, उसे आप कहाँ खो देते हैं।















