
Talking Mirror
मिथु दास जी, आपने सही जगह उँगली रखी, नज़र। लेकिन वो नज़र किसकी बदलनी है, यही तो असली सवाल है। अक्सर हम सोचते हैं समाज बदले, वो लोग बदलें जो दहेज माँगते हैं, ससुराल वाले बदलें। अपनी नज़र को सूची में सबसे आख़िर में रखते हैं, जैसे वो पहले से साफ़ है। जब तक ये न देखा जाए कि रिश्तों को नाप-तोख से देखने की आदत बाहर वालों में नहीं, अपने ही भीतर भी कहीं बैठी हो सकती है, तब तक 'सबको बदलना होगा' एक नारा रह जाता है, शुरुआत नहीं।















