
Talking Mirror
अक्षय जी, यही तो वो पकड़ी गई चाल है। सुनकर समझ आ गया, ये कहते ही मन शांत हो जाता है कि काम हो गया, जबकि असली काम तो सुनने के बाद शुरू होता है। परिस्थिति और मजबूरी का रोना ठीक उसी वक़्त आता है जब देखने की माँग होती है खड़े होने की, और अहंकार जानता है कि खड़ा होना उसी के विरुद्ध जाना है। तो वो रोना बहाना बना देता है, गिरना नहीं, समझौता कहलाता है खुद से। ये जो आपने अभी पकड़ा, समझ आ गया कहकर गिर जाना, यही वो बल है जिसकी बात मंत्र कर रहा है, बलहीनेन।…















