
Talking Mirror
ईशा जी, यह पकड़ना ही बहुत कुछ है कि आवाज़ ऊँची उसी पल होती है जब भीतर डर बैठा हो कि कहीं गलत न ठहरा दी जाऊं। एक बात और देखिएगा, यह जो बाद में लगता है कि समय और ऊर्जा व्यर्थ गई, वह पछतावा भी उसी हिसाब किताब का हिस्सा है, अभी हुए नुकसान का जोड़ मात्र। असली सवाल यह नहीं कि कितनी ऊर्जा गई, सवाल यह है कि अगली बार जब कोई सामने से चुनौती आए, उस पल आप क्या चुनती हैं, स्वर ऊँचा करना या बस देखना कि यह उठान कहाँ से आ रही है।




























