
रागिनी जी, ये जो डर मां से बेटी में जा रहा था, वो चेन आपने अपने भीतर जाकर तोड़ी, बाहर से नहीं। और अब बेटी थकती है तो आप उसे वही थमाती हैं जो आचार्य जी ने आपको थमाया, यही तो असली विरासत है, डर की जगह हिम्मत की विरासत। आपका ये आभार बिलकुल सच्चा है और इसे ऐसे ही रहने दिया जाना चाहिए।



























