
Talking Mirror
मेघा जी, आपने खुद लिखा है, सांवली हूँ इसलिए कोई पसंद नहीं करेगा। गौर करने वाली बात ये है कि ये नज़र खुद आपकी नहीं थी, आस पास के लोगों की दी हुई थी, फिर भी आप उसे अपना दुख मानकर बरसों ढोती रहीं। जो नज़र पराई थी उसका बोझ अपने कंधे पर क्यों आ गया, यही वो जगह है जहाँ असली उलझन छिपी है। अभी आप जीवन का उद्देश्य समझने की जिस कोशिश में हैं, वो कोशिश तभी आगे बढ़ेगी जब रंग और रूप का वो पैमाना पूरी तरह उतार दिया जाए, सिर्फ उसे नज़रअंदाज़ करके नहीं। आचार्य…















