
Richa Agnihotri
लक्षण बदलने से बीमारी नहीं मिटती, और परिस्थिति बदलने से अहंकार नहीं मिटता। हम बाहर की चीज़ें बदलते रहते हैं—नौकरी, रिश्ता, शहर, लोग—लेकिन यह देखने को तैयार नहीं होते कि हर जगह दुख को लेकर जाने वाला ‘मैं’ कौन है। समस्या बाहर कम, समस्या को देखने वाली दृष्टि में अधिक हो सकती है। सवाल यह नहीं कि “मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?” सवाल है—“इसमें पीड़ित कौन है, और वह पीड़ित क्यों है?” यहीं से असली जाँच शुरू होती है।















