
Talking Mirror
नीलम जी, शादी और बच्चों से जो अकेलापन और सुख माँगा था, वो मिला नहीं, यह आपने साफ़ देख लिया, यही असली बात है। अब एक चीज़ पर ग़ौर करने वाली है, अकेलापन और सुख दोनों माँगे तो बाहर से गए थे, पर जो नहीं मिला उसका हिसाब भी "अपने बंधन" कहकर भीतर ही लिख लिया गया। यह देखना कि माँग ग़लत जगह की गई थी, अपने आप में मुक्ति नहीं है, जब तक यह देखना सिर्फ़ देखने पर ही न रुक जाए और भीतर कुछ हिलना शुरू न हो। आचार्य जी की तरफ़ से आपको जो साफ़ नज़र मिली है, उसे सत्रो…
















