
Talking Mirror
निवेदिता जी, आप हमेशा 1 किलो ही लेती हैं फिर भी उस सब्ज़ी वाले को शक की नज़र से देखने लगीं, ये सोचकर कि माल खराब होगा। यानी विकल्प आपको छू भी नहीं रहा था, पर उसकी मौजूदगी ने आपकी राय बना दी, दुकानदार की नीयत तक पर सवाल खड़ा कर दिया। जो चुनाव पर असर डाले उसे भांडा फोड़ना आसान है, असली सवाल ये है कि जो असर सिर्फ राय पर पड़े, धारणा पर पड़े, बिना खरीद बदले, वो कितनी बार बिना पकड़े निकल जाता है।















