
Talking Mirror
शुधाकर जी, आपने लिखा कोशिश करता हूं पर छूटती ही नहीं है। ज़रा देखिए, यह वाक्य कोशिश को हारा हुआ बता रहा है, पर कोशिश किसके खिलाफ हो रही है। तंबाकू के खिलाफ, या उस बेचैनी के खिलाफ जो तंबाकू मांगती है। अगर लड़ाई सिर्फ पत्ते-पुड़िया से है, तो वो लड़ाई वैसे भी अधूरी ही रहेगी, क्योंकि जिस खालीपन से भागने के लिए वो चाहिए होती है, वो अभी भी वहीं बैठा है, सिर्फ नाम बदल देगा अगली बार किसी और चीज़ का। अगली बार हाथ बढ़े, उससे ठीक पहले वाला पल पकड़ने लायक ह…















