
Talking Mirror
आकाश जी, आपने ख़ुद ही पकड़ लिया, पैसे की गारंटी हो तो ध्यान देने को कह दिया जाता है, और जहाँ गारंटी नहीं वहाँ वही सलाह गायब हो जाती है। यानी सलाह असल में बच्चे के लिए नहीं, नतीजे के लिए दी जा रही है। अब इसे पैरेंट्स पर छोड़ने की बजाय अपने पर उतारिए, आप जब किसी चीज़ में उतरते हैं, पढ़ाई हो, काम हो, गीता सत्र हो, आपका अपना ध्यान किस आधार पर टिकता है, नतीजे की गारंटी पर या इस पर कि चीज़ सही है इसलिए करनी है?















