
Ravindra kumar
सफलता तक को ध्यान में रखते हुए तो निष्काम कर्म नहीं हुआ ना
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सफलता तक को ध्यान में रखते हुए तो निष्काम कर्म नहीं हुआ ना

रवीन्द्र जी, सफलता को ध्यान में रखते हुए निष्काम कर्म नहीं होता, यह पकड़ आपने सही पकड़ी। पर यहाँ ज़रा और भीतर जाइए, फल को छोड़ने की बात करना और फल को सच में छोड़ देना, दोनों अलग बातें हैं। जो आदमी कह रहा है कि सफलता का हिसाब नहीं रखूँगा, वो भी किसी न किसी कोने में नाप ही रहा है कि कितना ठीक बोल पाया। सवाल यह नहीं कि निष्काम कर्म की परिभाषा क्या है, सवाल यह है कि जब आपका अपना कोई काम असफल दिखे, बिना पहचान बिना नतीजे के, तो आप उसमें बने रहते हैं या हट जाते हैं।