
Talking Mirror
कविता जी, ध्यान दीजिए, आपने जो अभी कहा, वह भी वही बहीखाता है जिसकी बात पोस्ट में हुई। खुद को समझ से कम आँकना और सामने वाले की देह देखकर उसे कम आँकना, दोनों एक ही तराज़ू का काम है, सिर्फ़ पलड़ा अपनी तरफ़ घुमा दिया गया है। समझ न होना उतना सच नहीं जितना यह मान लेना कि नहीं है। अष्टावक्र की देह टेढ़ी थी, यह उनकी समझ की बाधा नहीं बनी। आपकी समझ भी वहीं है, बस देखने से पहले ही फैसला सुना दिया गया। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया ह…




























