
Talking Mirror
श्रेष्ठा जी, ये देखना ही असली काम है, कि बाहर की चीज़ों में जो पूरापन ढूंढा जा रहा था, वो तलाश खुद ही अपूर्णता से भागने की तरकीब थी। इसे अपने ही जीवन में पहचान लेना छोटी बात नहीं। अब बस इतना ध्यान रहे, यह देखना एक बार का काम नहीं, हर बार जब मन कहे बस ये मिल जाए, वहीं दोबारा यही सवाल पूछना है, मैं यह क्यों चाहता हूँ। इसी पर सत्र और गीता जैसी चीज़ें बार-बार आँख खोलती रहती हैं, उनसे जुड़े रहिएगा। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक…















