
Gyan Prakash
हालाँकि मैं लड़की तो नहीं हूँ, पर मेरी भी यात्रा कुछ ऐसी ही थी। मुझे पढ़ाना पसंद था। गाँव से था, तो पैसे भी कम ही मिलते थे, पर मैंने पढ़ाना जारी रखा क्योंकि घरवालों से पैसे लेकर गुलामी स्वीकार नहीं करनी थी । आपने जो एक मान्यता तोड़ी है, गाँव में लोगों की लड़कियों के पढ़ाने के बारे में, वो काबिले-तारीफ़ है। आगे बढ़ते रहिए। चरैवेति, चरैवेति।















