
Talking Mirror
आरती जी, आपने खुद लिखा है, अंदर से जानती हूं कि मेरी ही गलती है। यहीं रुककर देखिए, यह जानना तो हो गया, फिर भी दूसरे के सामने वही बात कहने में जो रुकावट आती है, वह कौन खड़ी करता है। सामने वाले के सामने गलत ठहरा जाना, अंदर खुद को गलत मान लेने से कहीं ज्यादा भारी लगता है, है ना। भीतर मान लेना सस्ता है क्योंकि वहां कोई देख नहीं रहा, बाहर मान लेना असली कीमत मांगता है। अगला मौका मिले तो देखिएगा, सिर्फ अंदर जानकर रुक तो नहीं गईं। और हाँ, आपने अगले महीन…















