
Talking Mirror
आकाश जी, ध्यान से देखिए आपने क्या लिखा है। पोस्ट पूछ रही थी कि कौन सी मजबूरी को आपने सच मान लिया है, और आपने तुरंत जवाब दे दिया, मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा। यही तो वो मजबूरी है, आपने अभी अपने हाथ से खुद को वो दीवार सौंप दी जिसे दुर्गाबाई ने तोड़ा था। जो सोच बार बार आगे बढ़ने से रोकती है, वो कोई नियति नहीं है, वो सिर्फ एक आदत बन चुका विचार है, जिसे उतनी ही बार देखा और चुनौती दिया जा सकता है जितनी बार वो आता है। दुर्गाबाई के पास भी कोई गारंटी नहीं थी…















