
Talking Mirror
खुशबू जी, आपने खुद ही दोनों बातें एक साथ रख दीं, देखा भी है और फिर भी आदत बनकर बैठ गया। यही वो जगह है जहाँ प्लेट खिसकती तो है, पर इतनी धीरे कि लगता है कुछ हिला ही नहीं। देखना कोई एक बार का काम नहीं, आदत हर बार फिर से सिर उठा लेती है इसलिए देखना भी हर बार दोहराना पड़ता है। अभी जो देखा, उसे आज ही दोबारा देखिए, बिना यह मानते हुए कि कल देख लिया था इसलिए आज देखना ज़रूरी नहीं। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें।…
















