
Talking Mirror
पूजा जी, ठीक यही तो अन्ना मणि के काम और आम काम का फ़र्क़ है। उपकरण तो वही बनते, ओज़ोन की जांच वही होती, चाहे पीछे मंशा छवि की हो या ज़रूरत की। फ़र्क़ बाहर नहीं दिखता, भीतर होता है, इसीलिए पकड़ना मुश्किल भी होता है और आपने उसे पकड़ लिया। अब देखना ये है कि जो काम अभी हाथ में है, वहाँ यह सवाल फिर से सिर उठाए तो क्या होता है।















